विदेशमंत्री ने एक बार फिर कहा है कि यूरोप को यह नहीं सोचना चाहिये कि ईरान उनकी प्रतीक्षा में रहेगा। विदेशमंत्री मोहम्मद जवाद ज़रीफ़ ने बल देकर कहा है कि यूरोपीय परमाणु समझौते के क्रियान्वयन में बहुत पीछे हैं और यूरोप की ओर से इंस्टेक्स का पेश किया जाना परमाणु समझौते को बाकी रखने का आरंभिक क़दम है और अब यूरोप के पास कोई बहाना नहीं है कि वह कार्य आरंभ करने में आना- कानी से काम ले।
विदेशमंत्री का यह बयान इस बात का सूचक है कि परमाणु समझौते पर अमल करने से यूरोप अभी बहुत दूर है। परमाणु समझौते से अमेरिका के निकल जाने के बाद यूरोप ने यह दर्शाने का प्रयास किया कि वह हर मामले में अमेरिका के साथ नहीं है परंतु व्यवहारिक रूप से उसका अमल स्वीकार्य नहीं रहा है।
फ्रांस के राष्ट्रपति एमानोएल मेक्रां ने इससे पहले कहा था कि इस्लामी गणतंत्र ईरान के संबंध में पेरिस का दृष्टिकोण अमेरिकी दृष्टिकोण जैसा नहीं है पंरतु साथ ही उन्होंने ईरान के प्रक्षेपास्त्रिक कार्यक्रम और क्षेत्र के बारे में अमेरिकी राग से राग मिलाया।
अंतरराष्ट्रीय मामलों के विशेषज्ञ अब्दुर्रज़ा फरजी राद यूरोप के दोमुखी खेल का विश्लेषण करते हुए कहते हैं" यूरोप का कार्यक्रम ईरान की प्रतिरक्षा क्षमता, प्रक्षेपास्त्रिक कार्यक्रम और क्षेत्र में ईरान की डिप्लोमेसी के बारे में अपनी मांगों को पेश करना है अतः यूरोप इस समय ईरान का परीक्षण कर रहा है ताकि अंत में वह ईरान को दिये जाने वाले समर्थन पैकेज के बदले में विशिष्टता ले।
इस बात में कोई संदेह नहीं है कि यूरोप ने हिसाब- किताब करने में गलती की है क्योंकि इस संबंध में ईरान का दृष्टिकोण स्पष्ट, पारदर्शी और दृढ़ है। अगर फ्रांस या कोई दूसरा यूरोपीय देश इस प्रकार का दृष्टिकोण अपनाये और अमेरिका की हां में हां मिलाकर ईरान का परिचय क्षेत्र में अस्थिरता फैलाने वाले देश के रूप में कराये तो ईरान निश्चित रूप से उचित प्रतिक्रिया दिखायेगा।
रविवार को तेहरान में विदेशमंत्रालय में फ्रांस के नये राजदूत को तलब किये जाने को इसी परिप्रेक्ष्य में देखा जा सकता है।
जो बात निश्चित है वह यह है कि ईरान परमाणु समझौते की रक्षा के लिए प्रयास करेगा पंरतु हर कीमत पर नहीं और उस समय तक परमाणु समझौते में बाकी रहेगा जब तक वह ईरान के राष्ट्रीय हितों से विरोधाभास न रखता हो।
इस्लामी क्रांति के वरिष्ठ नेता आयतुल्लाहिल उज़्मा सैयद अली ख़ामनेई ने अभी हाल ही में कहा था कि एतिहासिक अनुभव और पश्चिम का व्यवहार इस बात का सूचक है कि उनसे षडयंत्र, विश्वासघात और पीछे से छुरा घोंपने की अपेक्षा रखी जा सकती है किन्तु उनसे सहायता, सच्चाई और समरसता की आशा नहीं रखनी चाहिये।